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Day 17·भारत का पहला नागरिक-नेतृत्व वाला राजनीतिक आंदोलन
सदस्य:22 · लाइव डैशबोर्ड →
Bharat Banao

घोषणापत्र · नागरिक स्वामित्व

भारत आपका है

आप इस देश में रहने वाले सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं हैं। आप भारत के मालिक हैं। इसकी धरती, पानी, स्पेक्ट्रम, खनिज और सार्वजनिक संपत्ति में आपका हिस्सा है।

अधूरा लोकतंत्र

1947 में भारत आज़ाद हुआ। पर आम भारतीय आज भी अपनी ही सरकार के सामने आवेदक है।

  • अपने हक़ के लिए फ़ॉर्म भरता है।
  • अपनी पहचान बार-बार साबित करता है।
  • अपनी फ़ाइल ख़ुद खोजता है।
  • अपने पैसे का हिसाब माँगता है।
  • अपने इलाक़े का काम कराने के लिए किसी नेता की कृपा खोजता है।
  • और ग़लत प्रतिनिधि चुन लेने पर पाँच साल इंतज़ार करता है।

यह लोकतंत्र अधूरा है।

क्योंकि जनता सिर्फ़ सरकार चुनती है। सरकार चलाने में उसका असली हिस्सा बहुत कम रहता है।

रिश्ते को उलटना

नागरिक सरकार का beneficiary नहीं होगा। सरकार नागरिक की employee होगी।

  • भारत की प्राकृतिक संपत्ति जनता की है।
  • सार्वजनिक पैसा जनता का है।
  • सरकारी डेटा नागरिक का है।
  • स्थानीय बजट नागरिक का है।
  • और राजनीतिक पद जनता का दिया अस्थायी दायित्व है।

इसीलिए हमारा राष्ट्रीय संकल्प है:

हर भारतीय को हक़, हिस्सा और हिसाब।

दस ठोस तरीक़े

नारा नहीं, मशीनरी

स्वामित्व एक भावना नहीं, एक व्यवस्था है। ये दस तरीक़े उसे हक़, हिस्से और हिसाब में बदलते हैं। हर वादा या तो दुनिया में सिद्ध है, या भारत में पहले से मौजूद क़ानून पर टिका है।

01

Bharat Share

भारत में जन्मे हर नागरिक को एक क़ानूनी रूप से मान्य Bharat Share, यानी नागरिक स्वामित्व का चार्टर।

आज की कहानी

एक बच्चा भारत में जन्म लेता है। उसे एक जन्म प्रमाणपत्र मिलता है, जो बताता है कि वह कहाँ पैदा हुआ। पर कोई काग़ज़ यह नहीं कहता कि यह देश, और इसकी संपत्ति का एक हिस्सा, उसका भी है।

हम क्या करेंगे

यह कोई कंपनी का शेयर नहीं है। इसे बेचा, ख़रीदा या किसी कंपनी को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। यह बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र के साथ जारी होगा, और इसका असली अर्थ उसके पूरे जीवन में दिखेगा।

आज नागरिकता मुख्यतः पहचान और वोट का अधिकार देती है। Bharat Share नागरिकता को आर्थिक और लोकतांत्रिक स्वामित्व में बदल देता है।

Bharat Share हर भारतीय को पाँच हक़ देता है:

  • भारत की साझा संपत्ति में हिस्सेदारी।
  • एक व्यक्तिगत Opportunity Account।
  • अपने इलाक़े के विकास बजट पर मत।
  • सरकारी सेवा में देरी पर हर्जाना।
  • सार्वजनिक पैसे का पूरा डिजिटल हिसाब।

मूल सिद्धांत

उस पर लिखा होगा: भारत की संप्रभुता जनता में निहित है। यह नागरिक भारत का समान हिस्सेदार है।

02

Bharat Opportunity Account

भारत में कोई बच्चा अपना वयस्क जीवन शून्य पूँजी से शुरू न करे।

आज की कहानी

दो बच्चे एक ही दिन, एक ही शहर में जन्म लेते हैं, दोनों होशियार। अठारह साल बाद एक के पास पढ़ाई और कारोबार के लिए पूँजी है, दूसरे के पास सिर्फ़ उम्मीद। फ़र्क़ प्रतिभा का नहीं था, शुरुआत का था।

हम क्या करेंगे

आज दो समान प्रतिभाशाली बच्चे अलग ज़िंदगी जीते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि एक के परिवार के पास पूँजी, रिश्ते और सुरक्षा है, और दूसरे के पास सिर्फ़ मेहनत। स्कॉलरशिप शिक्षा की एक समस्या हल करती है; क़र्ज़ बच्चे को शुरुआत से ही कर्ज़दार बना देता है; नकद अक्सर तुरंत ख़र्च हो जाता है।

Bharat Banao हर बच्चे के लिए जन्म पर एक बंद (locked) Opportunity Account खोलेगा: सरकार का शुरुआती योगदान, ग़रीब, अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए ज़्यादा हिस्सा, परिवार का स्वैच्छिक योगदान, और Bharat Future Fund की कमाई।

18 से 25 की उम्र में, यह पैसा सिर्फ़ इन कामों के लिए:

  • उच्च शिक्षा या पेशेवर हुनर।
  • अपना कारोबार शुरू करना, या काम के औज़ार और मशीन।
  • नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना।
  • पहले घर की पहली क़िस्त।

मूल सिद्धांत

यह खैरात नहीं है। यह हर भारतीय की पहली असली पूँजी है। राशि चुनाव के किसी आँकड़े से नहीं, महँगाई और औसत आमदनी से जुड़ी होगी, और पूरी योजना सावधान लागत-आकलन के बाद चरणों में लागू होगी।

03

Bharat Future Fund

भारत की स्पेक्ट्रम, खनिज, सार्वजनिक ज़मीन और प्राकृतिक संपत्ति किसी एक सरकार की नहीं, हर पीढ़ी की साझा विरासत है।

आज की कहानी

सरकार स्पेक्ट्रम या कोई खदान बेचकर एक बार बड़ी रक़म कमाती है, और वह एक साल के बजट में ख़र्च हो जाती है। जो संपत्ति पीढ़ियों की थी, वह एक सरकार के कार्यकाल में ग़ायब हो जाती है।

हम क्या करेंगे

आज एक-बार मिलने वाली सार्वजनिक संपत्ति अक्सर एक साल के ख़र्च में ख़त्म हो जाती है। Bharat Banao एक संविधान से सुरक्षित Bharat Future Fund बनाएगा, जिसमें स्पेक्ट्रम और संसाधन की कमाई, खनन की रॉयल्टी, और प्रदूषण-शुल्क का एक तय हिस्सा जाएगा।

नियम साफ़ होंगे: आम टैक्स और सरकारी क़र्ज़ से यह फंड नहीं भरा जाएगा; रोज़मर्रा के राजनीतिक ख़र्च के लिए इसका मूलधन नहीं निकाला जाएगा; निवेश पूरी तरह सार्वजनिक होंगे; और इसका प्रबंधन स्वतंत्र पेशेवर करेंगे, संसद, CAG और नागरिक निगरानी के साथ।

फंड के परिपक्व होने पर उसकी टिकाऊ कमाई तीन जगह लगेगी: बच्चों के Opportunity Account, लंबी अवधि के राष्ट्रीय मिशन, और जब बजट इजाज़त दे तब एक समान नागरिक लाभांश।

किसने कर दिखाया

  • अलास्का का Permanent Fund (1976) तेल और खनिज की रॉयल्टी का एक हिस्सा अलग रखकर दुनिया भर में निवेश करता है और हर पात्र निवासी को हर साल लाभांश देता है (2025 में 6 लाख से ज़्यादा लोगों को $1,000; राशि हर साल तय होती है)।

    स्रोत: Alaska Dept. of Revenue, PFD
  • नॉर्वे का करीब $1.8 लाख-करोड़ का तेल-फंड भविष्य की पीढ़ियों के लिए बचत करता है (यह नागरिकों को सीधा लाभांश नहीं देता); मंगोलिया ने अपने खनिज-धन का हिस्सा नागरिकों को शेयर और नकद के रूप में बाँटा। यानी मॉडल असली है, और बचत-बनाम-लाभांश दोनों रूप मौजूद हैं।

    स्रोत: Norwegian Ministry of Finance; NRGI (Mongolia)

मूल सिद्धांत

भारत की संपत्ति बेचकर एक सरकार ख़र्च नहीं करेगी। उस संपत्ति का फ़ायदा पीढ़ियों तक हर भारतीय को मिलेगा।

04

जनता का बजट

हर नगरपालिका, वार्ड और ग्राम पंचायत के विकास बजट का कम-से-कम 10% नागरिक सीधे तय करें।

आज की कहानी

हर साल आपके वार्ड का बजट तय होता है, किसी दफ़्तर में, आपके बिना। फिर नेता आकर कहता है, 'मैंने आपको यह सड़क दी।' पैसा आपका था, फ़ैसला किसी और का।

हम क्या करेंगे

सरकार तकनीकी रूप से संभव कामों की सूची, उनकी लागत और रख-रखाव का असर प्रकाशित करेगी। फिर स्थानीय लोग तय करेंगे कि पहले क्या: नाली, स्कूल की मरम्मत, हेल्थ सेंटर, बस रूट, स्ट्रीटलाइट, पानी की पाइपलाइन या कचरा-प्रबंधन।

डिजिटल मतदान के साथ-साथ वार्ड सभा और ग्राम सभा में आमने-सामने मतदान भी होगा, ताकि स्मार्टफ़ोन या पढ़ाई की कमी किसी को बाहर न करे। एक सुरक्षा भी: अमीर इलाक़े पूरा बजट अपने लिए न ले लें; ग़रीब बस्तियों और ज़रूरी ढाँचे के लिए न्यूनतम हिस्सा पहले सुरक्षित रहेगा।

किसने कर दिखाया

  • नागरिक सीधे बजट का हिस्सा तय करने वाली यह व्यवस्था (सहभागी बजट) 1989 में पोर्तो अलेग्रे, ब्राज़ील में शुरू हुई और अब लैटिन अमेरिका, यूरोप, उत्तर अमेरिका, एशिया और अफ़्रीका के हज़ारों शहरों तक पहुँच चुकी है।

    स्रोत: Participatory budgeting (Schugurensky & Mook, 2024)
  • OECD भी सहभागी बजट को मुख्यतः स्थानीय-सरकार की व्यवस्था मानता है और स्थानीय सरकारों को इसके इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करता है, ताकि नागरिक तय कर सकें कि सार्वजनिक पैसा कैसे बँटे।

    स्रोत: OECD (2025), Citizen Participation in the Policy Cycle

मूल सिद्धांत

आज नेता कहता है: मैंने आपको सड़क दी। कल नागरिक कहेगा: हमने अपने पैसे से अपनी सड़क चुनी, नेता ने सिर्फ़ अपना काम किया।

यही असली लोकतंत्र है: फ़ैसला नागरिक के हाथ, नेता के हाथ नहीं।

05

Right to Time

हर सरकारी सेवा की क़ानूनी समय-सीमा हो, और सीमा पार होते ही हर्जाना अपने-आप नागरिक के खाते में पहुँचे।

आज की कहानी

एक दुकानदार फ़ाइल लेकर दफ़्तर के चक्कर काटता है। बिना रिश्वत के फ़ाइल नहीं सरकती। उसका हर दिन, उसकी मज़दूरी, सरकार की देरी की क़ीमत चुकाती है, और कोई जवाबदेह नहीं।

हम क्या करेंगे

हर आवेदन के साथ नागरिक को तुरंत मिले: ज़िम्मेदार अफ़सर का नाम, फ़ैसले की समय-सीमा, लाइव स्थिति, देरी का कारण, और अपील का रास्ता। हर्जाने के लिए अलग से शिकायत न करनी पड़े; देरी होते ही भुगतान ख़ुद हो।

बार-बार देरी पर विभाग का स्कोर गिरे, वरिष्ठ अफ़सर को जवाब देना पड़े, और लगातार नाकामी सार्वजनिक हो। यह घोषणा सबसे ग़रीब को सबसे ज़्यादा ताक़त देती है: अमीर एजेंट या वकील रख लेता है, ग़रीब अपना दिन और मज़दूरी खोता है।

किसने कर दिखाया

  • भारत के 20 से ज़्यादा राज्यों में पहले से Right to Public Services / सेवा-गारंटी क़ानून हैं, जो प्रमाणपत्र और राशन-कार्ड जैसी सेवाओं की समय-सीमा तय करते हैं और देरी पर ज़िम्मेदार अफ़सर पर जुर्माना लगाते हैं (कई राज्यों में रोज़ का करीब ₹250)। मध्य प्रदेश ने पहला (2010), बिहार ने दूसरा (2011)। Right to Time इसी मौजूद क़ानून में अपने-आप हर्जाने के दाँत लगाता है।

    स्रोत: Right to Public Services legislation (MP 2010, Bihar 2011)

मूल सिद्धांत

सरकार आपका समय बर्बाद करेगी, तो सरकार उसकी क़ीमत चुकाएगी।

अभी, बिना सत्ता के

यह सत्ता का इंतज़ार नहीं माँगता। Bharat Banao आज अपने सदस्य-शिकायत तंत्र पर इसका छोटा रूप चला सकता है: हर उठाए मुद्दे पर एक नाम, एक सार्वजनिक घड़ी और एक तारीख़, हमारे transparency-log पर दर्ज। एक भी असली उदाहरण इरादे को सबूत बना देता है।

06

Zero-Application India

सरकार के पास पर्याप्त जानकारी हो, तो अधिकार पाने के लिए नागरिक को आवेदन न करना पड़े; सेवा ख़ुद आगे आए।

आज की कहानी

सरकार को पहले से पता है कि बच्चा स्कूल की उम्र में आ गया, या बुज़ुर्ग की पेंशन बनती है। फिर भी नागरिक फ़ॉर्म, प्रमाणपत्र और लाइनों में अपना हक़ साबित करता फिरता है।

हम क्या करेंगे

अक्सर सरकार को पहले से पता होता है: बच्चा पैदा हुआ, स्कूल की उम्र आई, परिवार किसी लाभ का हक़दार है, पेंशन की उम्र आई, स्कॉलरशिप का नवीनीकरण है, लाइसेंस ख़त्म हो रहा है। फिर भी नागरिक से आवेदन, प्रमाणपत्र और सत्यापन माँगा जाता है।

भारत का रूप गोपनीयता-पहले होगा, बिना किसी विशाल केंद्रीय डेटाबेस के: हर विभाग और राज्य अपने रिकॉर्ड ख़ुद, एन्क्रिप्टेड रखे, और ज़रूरत पर रिकॉर्ड आपस में सिर्फ़ सहमति-आधारित, दर्ज और तय-समय की जाँच से मिलें, कहीं एक जगह जमा हुए बिना। सहमति साफ़ हो: नागरिक एक विभाग को, एक काम के लिए, एक रिकॉर्ड देखने की इजाज़त दे, जिसे वह कभी भी वापस ले सके, और हर बार किसने देखा यह उसे दिखे। धर्म, जाति, राय या प्रदर्शन के आधार पर कोई प्रोफाइलिंग नहीं, और कोई सोशल-क्रेडिट स्कोर नहीं; ज़रूरत के आधार पर हक़ देना (जैसे कल्याण के लिए आमदनी) क़ानून के तहत और खुले तौर पर ही हो। कोई अल्गोरिदम अकेले किसी का हक़ ख़त्म न कर सके।

किसने कर दिखाया

  • यूरोपीय संघ का Single Digital Gateway एक once-only सिद्धांत तय करता है, ताकि आम तौर पर नागरिक और कारोबार एक ही जानकारी सरकारी दफ़्तरों को सिर्फ़ एक बार दें (Regulation (EU) 2018/1724)। (इसका बाध्यकारी सीमा-पार रूप तय प्रक्रियाओं पर, नागरिक के अनुरोध पर लागू होता है।)

    स्रोत: EUR-Lex, Single Digital Gateway

मूल सिद्धांत

नागरिक अपनी पात्रता साबित न करे। सरकार अपनी मनाही साबित करे।

07

चुनो, नकारो, वापस बुलाओ

NOTA को असली नतीजे की ताक़त मिले, और जिसे जनता चुनती है उसे वापस भी बुला सके।

आज की कहानी

मतदान के दिन आप उस उम्मीदवार को चुनते हैं जो सबसे कम बुरा लगे। जीतने के बाद वह पाँच साल आपकी पहुँच से बाहर हो जाता है। आपका वोट उसे ताक़त देता है, पर वापस लेने की कोई चाबी आपके पास नहीं रहती।

हम क्या करेंगे

अगर NOTA सभी उम्मीदवारों से ज़्यादा वोट पाए और एक तय न्यूनतम हिस्सा पार करे, तो दोबारा चुनाव हो, और पहले चुनाव के नकारे गए उम्मीदवार उस तुरंत दोबारा चुनाव में खड़े न हों। इससे दलों को अच्छा उम्मीदवार देने की मजबूरी होगी।

वापस बुलाने का हक़ पहले सीधे चुने गए मेयर, नगर-अध्यक्ष और पंचायत प्रमुखों पर, सावधान सुरक्षा-उपायों के साथ: कार्यकाल के पहले आधे हिस्से में नहीं; कम-से-कम 25% सत्यापित मतदाताओं की याचिका; स्वतंत्र सत्यापन; न्यूनतम मतदान; हटाने के लिए साधारण बहुमत नहीं, स्पष्ट दो-तिहाई; और एक कार्यकाल में सिर्फ़ एक प्रयास। ताकि हर छोटी नाराज़गी पर अस्थिरता न हो, पर भ्रष्टाचार या पूरी तरह ग़ायब रहने पर जनता बेबस भी न रहे।

किसने कर दिखाया

  • आज भारत में NOTA का कोई नतीजा-असर नहीं: चुनाव आयोग के अनुसार, NOTA को सबसे ज़्यादा वोट मिलने पर भी सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार ही निर्वाचित होता है (NOTA, 2013 के सुप्रीम कोर्ट के PUCL फ़ैसले से बना)।

    स्रोत: ECI clarification; PUCL v. Union of India (2013)
  • वापस बुलाने का हक़ भारत में पहले से सिर्फ़ स्थानीय स्तर पर है: मध्य प्रदेश (पहला, 2001), छत्तीसगढ़, बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों में पंचायत/नगर निकायों पर; सांसदों या विधायकों पर नहीं। हमारा क़दम इसी सिद्ध, स्थानीय रास्ते से शुरू होता है।

    स्रोत: Right to recall laws in India

मूल सिद्धांत

जिसे जनता चुन सकती है, उसे जनता नकार भी सके। जिसे जनता ताक़त देती है, उससे ताक़त वापस भी ले सके।

08

हर रुपये का GPS

हर सार्वजनिक परियोजना की एक डिजिटल पहचान हो, और किसी भी सड़क, स्कूल या परियोजना पर QR स्कैन करते ही पूरा हिसाब खुले।

आज की कहानी

गली की सड़क हर बरसात में टूट जाती है। किसने बनाई, कितने में, कौन ज़िम्मेदार है, कोई नहीं जानता। शिकायत एक डिब्बे में गिरती है, और वहीं ख़त्म हो जाती है।

हम क्या करेंगे

स्कैन पर नागरिक देखे: परियोजना क्यों मंज़ूर हुई, बजट कितना था, पैसा कहाँ से आया, बोली लगाने वाले कौन थे, ठेकेदार और असली मालिक कौन है, कितना भुगतान हुआ, मूल समय-सीमा क्या थी, लागत क्यों बढ़ी, आज काम कहाँ तक है, रख-रखाव किसकी ज़िम्मेदारी है, और शिकायत किस अफ़सर को जाए।

पूरा होना सिर्फ़ ठेकेदार या विभाग की तस्वीर से तय न हो। स्थानीय नागरिक, मान्यता-प्राप्त इंजीनियर और स्वतंत्र ऑडिटर भी सबूत डाल सकें।

मूल सिद्धांत

सड़क पर गड्ढा दिखे, तो सिर्फ़ शिकायत नहीं, ज़िम्मेदार व्यक्ति का नाम दिखे।

अभी, बिना सत्ता के

यह सत्ता का इंतज़ार नहीं माँगता। Bharat Banao यह सिद्धांत आज ख़ुद पर लागू करता है: हमारा सार्वजनिक funding-लेजर और फ़ैसलों का transparency-log हर रुपये और हर फ़ैसले को नाम और तारीख़ के साथ दिखाते हैं, शून्य को शून्य लिखते हुए।

09

Bharat Seva Year

18 से 25 के हर युवा को एक वैकल्पिक, वेतन-सहित राष्ट्रीय-सेवा का मौक़ा, जो जीवन की पहली उड़ान दे।

आज की कहानी

अठारह साल का एक नौजवान, डिग्री और दुनिया के बीच खड़ा, न अनुभव, न रास्ता। और दूसरी ओर देश को हाथ चाहिए, स्कूलों में, अस्पतालों में, गाँवों में।

हम क्या करेंगे

वे बच्चों को बुनियादी पढ़ाई सिखाने, जन-स्वास्थ्य, बुज़ुर्गों की देखभाल, आपदा-राहत, जल और पर्यावरण की बहाली, अदालतों के डिजिटलीकरण या आकांक्षी ज़िलों में काम कर सकें।

बदले में मिले: गुज़ारे का भत्ता, बीमा, पेशेवर ट्रेनिंग, एक राष्ट्रीय प्रमाण-पत्र, Opportunity Account में अतिरिक्त योगदान, और आगे की पढ़ाई व भर्ती में मान्यता। यह अनिवार्य सैन्य सेवा नहीं; यह एक स्वैच्छिक राष्ट्रीय पुल है, जहाँ केरल का युवा राजस्थान में और बिहार का युवा कर्नाटक में काम कर सके।

मूल सिद्धांत

एक साल भारत के नाम। भारत देगा जीवन की पहली उड़ान।

यह रोज़गार योजना से बड़ा है: यह भारत की अलग-अलग जातियों, क्षेत्रों और भाषाओं को एक साझा अनुभव में जोड़ता है।

10

कोई कानून अमर नहीं

हर आम आर्थिक और प्रशासनिक क़ानून के साथ उसका मक़सद, लागत और समय-सीमा हो, और सात साल बाद उसकी समीक्षा अपने-आप हो।

आज की कहानी

एक नियम सालों पहले बना, किसी अब भूली हुई वजह से। आज भी हर नागरिक और हर दुकान उसका पालन करती है, पर कोई नहीं पूछता कि वह आज भी ज़रूरी है या नहीं।

हम क्या करेंगे

हर ऐसे क़ानून के साथ हो: उसका उद्देश्य, सार्वजनिक लागत, नागरिक-अधिकार पर असर, पालन का बोझ, सफलता का पैमाना, और समीक्षा की तारीख़। सात साल बाद अगर सरकार उसकी ज़रूरत और असर साबित न कर सके, तो वह ख़त्म हो या सरल हो।

अपवाद रहेंगे: मौलिक अधिकार, मुख्य आपराधिक क़ानून, संवैधानिक संस्थाएँ, और राष्ट्रीय-सुरक्षा से जुड़े टिकाऊ क़ानून।

मूल सिद्धांत

क़ानून नागरिक से हर दिन पालन माँगता है। अब क़ानून भी समय-समय पर अपना औचित्य साबित करे।

स्वामित्व, सबूत के साथ

इनमें से कुछ भी जादू नहीं है। हर हक़ या तो दुनिया में चल चुका है, या भारत के क़ानून में पहले से है।

हक़ माँगा नहीं जाता, स्थापित किया जाता है।

सत्ता से पहले, ख़ुद से शुरू

भारत बनाओ क़ानून का इंतज़ार किए बिना पहले ख़ुद बदलेगा

ऊपर के बड़े वादे सत्ता माँगते हैं, जो अभी हमारे पास नहीं है। पर ये क़दम आज, बिना किसी पद के, हम ख़ुद पर लागू कर सकते हैं। यही वो हक़ है जो बाक़ी वादों का भरोसा कमाता है।

  • उम्मीदवार के लिए खुली स्थानीय प्राइमरी (पूर्व-चयन)।
  • एक पद पर ज़्यादा से ज़्यादा दो लगातार कार्यकाल।
  • उम्मीदवार-चयन का आधार और कारण सार्वजनिक।
  • गंभीर आपराधिक आरोप और हित-टकराव के साफ़ मानक।
  • चंदे का करीब-रीयल-टाइम खुलासा और उम्मीदवार-ख़र्च का सार्वजनिक लेजर।
  • परिवार के आधार पर अपने-आप टिकट नहीं।

आज की सच्चाई, सबूत के साथ

हमने अब तक क्या किया है

हम कुछ नहीं छिपाते। यहाँ हमारे असली आँकड़े हैं, शून्य को शून्य लिखते हुए। आप सब कुछ ख़ुद जाँच सकते हैं।

22

सत्यापित सदस्य, आज तक

1

नागरिकों के उठाए मुद्दे

0

अब तक जुटाया गया. हर दानदाता सार्वजनिक।

ईमानदार बात

यह घोषणापत्र वादों की सूची नहीं, एक दिशा है। इनमें से कोई भी अपने-आप बाध्यकारी नहीं है। बाध्यकारी सिर्फ़ एक चीज़ है: हर उम्मीदवार का विकास कॉन्ट्रैक्ट, जो नाम, तारीख़ और सार्वजनिक हिसाब के साथ बँधता है।

हर बाहरी दावा 2026 में स्रोत से जाँचा गया; हर स्रोत-लिंक खुला है।

दूसरे दल कहते हैं: हम आपको देंगे। भारत बनाओ कहता है: जो आपका है, उस पर आपका अधिकार स्थापित करेंगे।
· Bharat Banao

भारत आपका है। भारत बनाओ।

हम भारत को लाभार्थियों का देश नहीं, मालिकों का गणराज्य बनाएँगे।

मेरा हक़। मेरा हिस्सा। मेरा हिसाब।

न याचक। न केवल मतदाता। हर भारतीय मालिक।

भारत आपका है। भारत बनाओ।

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