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हमारा घोषणापत्र · सपनों का भारत
यह हमारा घोषणापत्र भी है और सपना भी, एक ही जगह। हमने इसे किसी कमरे में नहीं लिखा, आपके सपनों और मुद्दों से गिनकर बनाया; हर मोर्चे पर दुनिया से नापा; और वही ठोस रास्ते रखे जो कहीं न कहीं सच में काम कर चुके हैं।
बड़ा सोचिए
यह सपना नहीं। यह हिसाब है।
जो देश आज हमसे आगे हैं, उनमें से कई कल हमसे पीछे थे। दक्षिण कोरिया, वियतनाम, रवांडा, बांग्लादेश, सबने वहीं से शुरू किया जहाँ हम आज खड़े हैं, और एक-दो पीढ़ी में दुनिया को चौंका दिया। उनके पास हमसे ज़्यादा लोग, ज़्यादा पैसा या ज़्यादा वक़्त नहीं था। फ़र्क़ सिर्फ़ एक था: हर काम पर किसी का नाम, एक तारीख़, और सबके सामने हिसाब।
इस पन्ने को कैसे पढ़ें
यह कोई वादा नहीं है। यह हमारी सोच और वो रास्ता है जिसके लिए हम लड़ेंगे, उन तरीक़ों पर जो सच में कहीं काम कर चुके हैं। इकलौती बाध्यकारी प्रतिबद्धता हर उम्मीदवार का विकास कॉन्ट्रैक्ट है, जो जीतने पर एक तय समय-सीमा और सार्वजनिक रिपोर्ट कार्ड के साथ बँधता है।
अब तक इन संकल्पों को आकार देने वाली आवाज़ें
पूरी दुनिया गवाह है
हर महाद्वीप से, उन देशों की असली कहानियाँ जिन्होंने वो कर दिखाया जो नामुमकिन लगता था। हर दावे के साथ स्रोत। अगर वे, तो हम क्यों नहीं?
1960 में अफ़्रीका के ज़्यादातर देशों से भी ग़रीब, प्रति व्यक्ति आय सिर्फ़ $158। दो पीढ़ी में $36,000 पार कर दुनिया की सबसे अमीर अर्थव्यवस्थाओं में।
प्रति व्यक्ति GDP $158 (1960) से बढ़कर $36,238 (2024), यानी 64 साल में करीब 228 गुना।
उन्होंने जो कियादशकों लगातार: निर्यात-आधारित मैन्युफ़ैक्चरिंग, शिक्षा में भारी निवेश, और लंबी-अवधि की अनुशासित योजना।
स्रोत: विश्व बैंक, 2024 ↗1992 में भारत से भी ग़रीब, दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में। एक पीढ़ी में घोर ग़रीबी लगभग ख़त्म।
$1.90/दिन पर ग़रीबी 52.3% (1992) से गिरकर 1.8% (2018); प्रति व्यक्ति GDP $700 से कम (1986) से बढ़कर करीब $4,500 (2023)।
उन्होंने जो किया1986 के 'दोई मोई' सुधार: बाज़ार खोले, वैश्विक व्यापार से जुड़े, और फ़ायदा शिक्षा व ग्रामीण विकास से सब तक पहुँचाया।
स्रोत: विश्व बैंक / WDI ↗भारत से भी नीचे से शुरू कर, चीन ने चार दशकों में करीब 80 करोड़ लोगों को घोर ग़रीबी से निकाला, इतिहास की सबसे बड़ी छलाँग।
करीब चार दशकों में लगभग 80 करोड़ लोग $1.90/दिन की रेखा से ऊपर आए, दुनिया की कुल ग़रीबी-कमी का करीब तीन-चौथाई।
उन्होंने जो कियादशकों की व्यापक आर्थिक वृद्धि और सुधार, जिसने करोड़ों को खेती से उद्योग और शहरों में पहुँचाया।
स्रोत: विश्व बैंक, 2022 ↗1971 में अकाल में जन्मा, भारत से ग़रीब पड़ोसी, आज उसके लोग भारतीयों से ज़्यादा जीते हैं।
2022 में जीवन-प्रत्याशा करीब 74.3 साल बनाम भारत के 71.7; 2020 में प्रति व्यक्ति आय में भी पहली बार भारत से आगे निकला।
उन्होंने जो कियामहिलाओं में लगातार निवेश, बड़े पैमाने पर टीकाकरण, NGO-आधारित सामुदायिक स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और गारमेंट नौकरियाँ।
स्रोत: विश्व बैंक, 2022 ↗1994 के नरसंहार की भूमि, आज सत्ता में महिलाओं के मामले में दुनिया में नंबर 1: संसद में 61% महिलाएँ।
रवांडा की संसद में महिलाएँ 61% (2023, 2024 चुनाव के बाद 63.8%), दुनिया में पहले नंबर पर, जबकि वैश्विक औसत सिर्फ़ 27% और भारत करीब 14%।
उन्होंने जो किया2003 के संविधान में फ़ैसले-वाले पदों पर महिलाओं के लिए 30% का बाध्यकारी कोटा, फिर जनता उससे कहीं आगे निकल गई।
स्रोत: UN / IPU, 2024 ↗बिना बैंक, बिना ब्रांच: एक मोबाइल-पैसा सेवा ने 1.94 लाख परिवारों को घोर ग़रीबी से निकाला।
एक समीक्षित Science अध्ययन (2016) में, M-PESA तक पहुँच ने 1.94 लाख परिवारों (करीब 2%) को घोर ग़रीबी से निकाला और 1.85 लाख महिलाओं को खेती से कारोबार की ओर बढ़ाया।
उन्होंने जो किया2007 में बैंक ब्रांच का इंतज़ार छोड़कर, साधारण मोबाइल फ़ोन से पैसे भेजने और रखने की सुविधा (M-PESA)।
स्रोत: Science, 2016 ↗1948 में सेना ही ख़त्म कर दी, वो पैसा अस्पतालों और स्कूलों में लगाया। आज उसके लोग अमेरिकियों से ज़्यादा जीते हैं।
जीवन-प्रत्याशा 80.8 साल (2023), अमेरिका के 78.4 से ज़्यादा, वो भी कई गुना कम आमदनी और स्वास्थ्य-ख़र्च पर।
उन्होंने जो कियासंविधान से सेना ख़त्म कर वो बजट हमेशा के लिए सर्वव्यापी स्वास्थ्य और अनिवार्य शिक्षा में मोड़ दिया।
स्रोत: विश्व बैंक, 2023 ↗ग़रीब माओं को बच्चों को स्कूल और क्लिनिक भेजने पर सीधे पैसा देकर, ब्राज़ील ने एक दशक में ग़रीबी आधी कर दी।
बोल्सा फ़मीलिया करीब 5 करोड़ लोगों (आबादी का एक-चौथाई) तक पहुँचा और एक दशक में ग़रीबी 9.7% से घटाकर 4.3% कर दी।
उन्होंने जो कियाग़रीब परिवारों (ख़ासकर माओं) को सीधे नकद, इस शर्त पर कि बच्चे स्कूल जाएँ और टीके व जाँच पूरे रखें।
स्रोत: विश्व बैंक, 2014 ↗एक पीढ़ी में झुग्गियों से निकलकर: करीब 80% लोग दर्जे के सरकारी फ़्लैट में रहते हैं, और उनमें से 10 में से 9 उसके मालिक हैं।
आज 10 लाख से ज़्यादा HDB फ़्लैट, करीब 80% परिवारों के घर, जिनमें से 10 में से 9 मालिक हैं; पहले ही 3 साल में 31,000+ फ़्लैट बने, सबमें नल का पानी और साफ़ सफ़ाई।
उन्होंने जो कियाएक राष्ट्रीय हाउसिंग बोर्ड ने बड़े पैमाने पर फ़्लैट बनाए, और 1968 से लोगों को अपनी बचत (CPF) से वही फ़्लैट ख़रीदने दिया, किराए पर नहीं।
स्रोत: सिंगापुर सरकार / HDB ↗इंडोनेशिया ने खुले में शौच को एक-तिहाई आबादी से घटाकर लगभग शून्य कर दिया, सिर्फ़ 14 साल में, 10.4 करोड़ लोग मुक्त।
खुले में शौच 35.46% (2010) से गिरकर 3.2% (2024); छह राज्यों में 10.4 करोड़ से ज़्यादा लोग अब खुले में शौच नहीं करते।
उन्होंने जो कियासिर्फ़ शौचालय बाँटने के बजाय, पूरे गाँव को मिलकर खुले में शौच ख़त्म करने के लिए प्रेरित करना (समुदाय-आधारित कुल स्वच्छता, STBM)।
स्रोत: UNICEF / JMP ↗एक तेल-समृद्ध रेगिस्तानी देश ने दुनिया की अब तक की सबसे सस्ती बिजली का दाम तय किया, और वो आई सूरज से, तेल से नहीं।
अबू धाबी के 2GW अल-धफ़रा सोलर प्रोजेक्ट को 2020 में दुनिया का रिकॉर्ड-न्यूनतम दाम मिला: सिर्फ़ $0.0135 प्रति यूनिट (kWh), पुराने रिकॉर्ड $0.0164 से भी कम।
उन्होंने जो कियाबड़े पैमाने पर सोलर के लिए सरकारी खुली नीलामी, जिसमें दुनिया भर के बोलीदाता और सस्ता वित्त आए और दाम रिकॉर्ड नीचे ले गए।
स्रोत: PV-Tech, 2020 ↗1991 में टूटे सोवियत संघ से निकला, भारत से ग़रीब देश, आज दुनिया की सबसे डिजिटल सरकारों में: 99% सरकारी काम फ़ोन पर।
2024 तक 99% सरकारी सेवाएँ 24x7 ऑनलाइन; UN के ई-गवर्नमेंट सूचकांक में दुनिया में दूसरे नंबर पर (डेनमार्क के ठीक पीछे, टॉप तीन में)।
उन्होंने जो कियाकरीब हर नागरिक के लिए एक सुरक्षित डिजिटल पहचान (e-ID, 2002 से) और एक जुड़ा हुआ डेटा-ढाँचा, ताकि टैक्स से कंपनी रजिस्ट्रेशन तक सब एक क्लिक पर।
स्रोत: UN ई-गवर्नमेंट सर्वे, 2024 ↗अगर वे, तो हम क्यों नहीं? यह रहा हर मोर्चे पर हमारा लक्ष्य और रास्ता।
घर का नौजवान यहीं काम पाए, किसी और के देश में नहीं।
सपना
एक सुबह जब घर का नौजवान काम पर निकले, किसी दूर शहर या विदेश नहीं, अपने ही शहर में। एक छोटा दुकानदार बिना रिश्वत और बिना महीनों के चक्कर अपना काम बढ़ा सके। हुनर हो तो काम मिले। यही वो भारत है जिसके लिए हम लड़ते हैं।
दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
काम में महिलाएँ
भारतभारत में सिर्फ़ 31% महिलाएँ (15+) काम में हैं (2023), दुनिया में सबसे कम में से एक।
आगेवियतनाम में यह 69% है (चीन 60%), यानी भारत से दोगुने से ज़्यादा।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींवियतनाम ने महिलाओं के घरों के पास ही श्रम-गहन निर्यात कारख़ाने (कपड़ा, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स) लगाकर करोड़ों महिलाओं को काम दिया; भारत भारी, पुरुष-प्रधान उद्योग पर टिका रहा।
स्रोत: विश्व बैंक, 2023 ↗अर्थव्यवस्था में मैन्युफ़ैक्चरिंग
भारतभारत की GDP में मैन्युफ़ैक्चरिंग सिर्फ़ 13% है (2023), और घट रही है।
आगेचीन में 25.5% और वियतनाम में 24%, यानी करीब दोगुना।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींचीन और वियतनाम 'दुनिया की फ़ैक्ट्री' बने, निर्यात-आधारित उत्पादन पर दशकों लगातार लगाकर; भारत का 'मेक इन इंडिया' अब तक यह हिस्सा बढ़ा नहीं पाया।
स्रोत: विश्व बैंक, 2023 ↗हमारा लक्ष्य
हर दूसरी महिला को काम का मौक़ा (आज के 31% से वियतनाम जैसे स्तर तक), और मैन्युफ़ैक्चरिंग को GDP का चौथाई। करोड़ों नई नौकरियाँ, यहीं भारत में।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
सबसे ग़रीब परिवार को एक बार पूँजी (जैसे पशु या छोटा सामान) और साथ में हुनर-सहारा देना, ताकि वे ख़ुद कमाई शुरू कर सकें।
सबूतपश्चिम बंगाल में हुए एक नियंत्रित परीक्षण (RCT) में, दस साल बाद ऐसे परिवारों की आमदनी नियंत्रण समूह से करीब 37% ज़्यादा थी (मासिक $680 बनाम $497)।
मौजूदा हुनर-ट्रेनिंग में नौकरी के असली मौक़ों पर दो छोटी जानकारी-बैठकें जोड़ना, ताकि नौजवान सही काम चुनें और उसमें टिकें।
सबूतबिहार और झारखंड में 2,488 प्रशिक्षुओं पर हुए RCT (2017-2020) में, दो जानकारी-बैठकों में शामिल नौजवान अपनी मिली नौकरी में टिके रहने में 11 अंक (18%) ज़्यादा सफल रहे।
गाँव में जाकर युवतियों के लिए नौकरी की जानकारी और भर्ती-बैठकें करना, ताकि उन्हें पता चले कि औपचारिक काम (जैसे BPO) मौजूद है।
सबूतहरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 160 गाँवों के RCT में, 18-24 साल की महिलाएँ काम में 4.6 अंक ज़्यादा शामिल हुईं, और 6-17 साल की लड़कियाँ स्कूल में 5 अंक ज़्यादा रहीं।
असली चाबी
असली रुकावट स्कीमों की कमी नहीं है। रुकावट यह है कि किसी एक का नाम लेकर यह पूछा ही नहीं जाता कि इलाक़े के कितने लोगों को सच में काम या लाइसेंस समय पर मिला। हमारी चाबी: हर रोज़गार और हर मंज़ूरी पर एक नाम, एक तय तारीख़, और सबके सामने हिसाब।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
इतनी आवाज़ें इस पर आईं
यह कहाँ से आया: नौकरी और छोटे कारोबार से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
पास का अस्पताल जो सच में चले, और इलाज जो परिवार को क़र्ज़ में न डाले।
सपना
एक ऐसा भारत जहाँ बीमार पड़ने का मतलब घर बिकना न हो। पास का अस्पताल खुला हो, डॉक्टर मौजूद हो, ज़रूरी दवा और जाँच वहीं मिले। इलाज राहत बने, ज़िंदगी भर का क़र्ज़ नहीं।
आज की सच्चाई
इलाज के ख़र्च ने करीब 9.7 करोड़ भारतीयों को ग़रीबी में धकेला, और सबसे बड़ा बोझ रोज़ की OPD फ़ीस है, बड़े अस्पताल का बिल नहीं।
स्रोत: समीक्षित अध्ययन (NIH) ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
सरकार का स्वास्थ्य पर ख़र्च
भारतसरकार भारत में स्वास्थ्य पर GDP का सिर्फ़ 1.4% ख़र्च करती है (2022), दुनिया में सबसे कम में से एक।
आगेथाईलैंड 3.9% और चीन 3.4% ख़र्च करते हैं, यानी भारत से करीब तिगुना।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींथाईलैंड ने 2002 में कर से चलने वाली सर्वव्यापी स्वास्थ्य योजना का क़ानून बनाया; भारत ने ऐसी कोई योजना नहीं बनाई और सरकारी ख़र्च 1% के आसपास ही रखा।
स्रोत: विश्व बैंक, 2022 ↗शिशु मृत्यु, हमारे जैसी आमदनी पर
भारतभारत में हर 1000 में 24.5 शिशु पहले साल में मर जाते हैं (2023)।
आगेश्रीलंका में यह सिर्फ़ 5.3 है, करीब पाँचवाँ हिस्सा, वो भी हमारे जैसी आमदनी पर।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींश्रीलंका ने दशकों में बिना शुल्क प्राथमिक और मातृ-स्वास्थ्य का जाल बनाया, हर इलाक़े में पब्लिक हेल्थ मिडवाइफ़; भारत ने ऐसी सर्वव्यापी प्राथमिक देखभाल नहीं बनाई।
स्रोत: विश्व बैंक, 2023 ↗हमारा लक्ष्य
स्वास्थ्य पर सरकारी ख़र्च तिगुना, ताकि थाईलैंड जैसी सर्वव्यापी देखभाल मिले और शिशु-मृत्यु श्रीलंका के स्तर तक गिरे। बीमारी कभी किसी घर को न बेचे।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
राज्य स्तर पर थोक में दवा ख़रीदना और हर सरकारी अस्पताल में ज़रूरी दवाएँ बिना शुल्क देना (तमिलनाडु का TNMSC मॉडल)।
सबूत2014 में, सरकारी अस्पताल में भर्ती पर दवा का अपनी जेब का ख़र्च तमिलनाडु में सिर्फ़ ₹150 था, जबकि राजस्थान में ₹1,516 और पश्चिम बंगाल में ₹1,917; तमिलनाडु में 95% से ज़्यादा भर्ती-ख़र्च सरकार ने उठाया।
राज्यों को हर साल नापकर, एक स्वतंत्र संस्था से रैंक करना कि किसका स्वास्थ्य सुधरा, ताकि सुधार की होड़ लगे।
सबूतNITI आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक (विश्व बैंक की मदद से) में झारखंड एक ही साल में सबसे ज़्यादा सुधरा: पाँच साल से कम उम्र में मृत्यु दर 44 से 39 (प्रति 1000), पूर्ण टीकाकरण 81% से 88%, संस्थागत प्रसव 61% से 67%।
हर इलाक़े के लिए एक तय टीम (डॉक्टर, नर्स और तनख़्वाह पाने वाले सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी जो घर-घर जाएँ) बनाना, यानी पास की प्राथमिक देखभाल को मज़बूत करना (ब्राज़ील का फ़ैमिली हेल्थ मॉडल)।
सबूतब्राज़ील में इस मॉडल का दायरा बढ़ने पर शिशु मृत्यु दर 13% से 22% तक घटी (1996-2004), सबसे ज़्यादा फ़ायदा सबसे ग़रीब इलाक़ों में।
असली चाबी
इलाज का बोझ इसलिए नहीं है कि बड़े अस्पताल नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि पास की डिस्पेंसरी में डॉक्टर, दवा और जाँच का कोई भरोसा नहीं। हमारी चाबी: हर मोहल्ले के स्वास्थ्य केंद्र की हाज़िरी, दवा और जाँच सबके सामने, ताकि लोग दूर और महँगे इलाज पर मजबूर न हों।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
इतनी आवाज़ें इस पर आईं
यह कहाँ से आया: स्वास्थ्य और अस्पताल से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
हर घर तक साफ़ पानी, और हर मोहल्ले में साफ़-सफ़ाई।
सपना
एक भारत जहाँ नल खोलते ही साफ़ पानी आए, टैंकर के पीछे न भागना पड़े। गली की नाली बंद न हो, कूड़ा वक़्त पर उठे, और बच्चे साफ़ माहौल में बड़े हों। यह कोई विलासिता नहीं, हर परिवार का हक़ है।
आज की सच्चाई
2011 की जनगणना में झुग्गियों के 34% घरों में शौचालय तक नहीं था, और करीब 19% लोग खुले में शौच करते थे।
स्रोत: जनगणना 2011 (NBO) ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
घर पर सुरक्षित पानी
भारतभारत में 73% लोगों को घर पर सुरक्षित पानी मिलता है (2022), ठीक दुनिया के औसत पर।
आगेसिंगापुर में यह 100% और दक्षिण कोरिया में 99% है, सीधे नल से पीने लायक़।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींसिंगापुर ने हर घर तक 24 घंटे पाइप से शुद्ध पानी पहुँचाया और साल में 5 लाख से ज़्यादा पानी-जाँच करता है; भारत अभी जल जीवन मिशन से यह कमी पाट रहा है।
स्रोत: विश्व बैंक / JMP, 2022 ↗मैला सच में शोधित होना
भारतभारत में 59% लोगों के पास सुरक्षित-प्रबंधित शौचालय है (2022), पर शहरों का ज़्यादातर मैला कभी ट्रीट ही नहीं होता।
आगेचीन में यह 67% है।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींचीन ने 2015 से 'टॉयलेट रेवोल्यूशन' में 4.7 करोड़ ग्रामीण शौचालय सुधारे, और सिर्फ़ शौचालय नहीं, मैले के शोधन को भी अनिवार्य किया; भारत ने शौचालय तो बनाए पर शोधन का जाल नहीं।
स्रोत: विश्व बैंक / JMP, 2022 ↗हमारा लक्ष्य
हर घर में सीधे नल से पीने लायक़ पानी, सिंगापुर की तरह, और हर बूँद मैला सच में शोधित। टैंकर के पीछे भागना बीते कल की बात हो।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
गाँव-गाँव पाइप से पानी पहुँचाना (जल जीवन मिशन): हर घर तक नल, और हर भुगतान से पहले तीसरे पक्ष की जाँच, सब एक सार्वजनिक डैशबोर्ड पर।
सबूतनल वाले ग्रामीण घर 15 अगस्त 2019 को 3.23 करोड़ (17%) से बढ़कर 14 अगस्त 2024 तक 15.07 करोड़ (78%) हो गए; 11 राज्य और केंद्र-शासित प्रदेश 100% पर पहुँचे।
घर-घर शौचालय बनाना और व्यवहार बदलने का अभियान, पूरे ज़िले को खुले में शौच से मुक्त करने के लक्ष्य के साथ (स्वच्छ भारत मिशन)।
सबूतएक अध्ययन (2011-2020) में, जिन ज़िलों में 30% से ज़्यादा घरों में शौचालय बने वहाँ प्रति 1000 जन्म पर 5.3 कम शिशु मृत्यु हुईं; देश में खुले में शौच 60% से घटकर 19% रह गया।
स्थानीय फ़ैसलों में महिलाओं को असली अधिकार देना, क्योंकि वे पानी जैसी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को प्राथमिकता देती हैं।
सबूत73वें संविधान संशोधन के तहत जहाँ प्रधान का पद महिलाओं के लिए संयोग से (रैंडम) आरक्षित हुआ, वहाँ पीने के पानी की सुविधाएँ करीब 62% ज़्यादा बनीं या ठीक हुईं। आरक्षण रैंडम था, इसलिए यह असर पक्का है।
असली चाबी
पानी और सफ़ाई इसलिए नहीं रुकती कि पैसा नहीं है, बल्कि इसलिए कि कोई नहीं बताता कि किस मोहल्ले तक पानी पहुँचा और कहाँ नाली कब साफ़ हुई। हमारी चाबी: हर इलाक़े का पानी और सफ़ाई का शेड्यूल और नतीजा सार्वजनिक, ताकि छूटा हुआ मोहल्ला छुप न सके।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
अभी इस पर कोई सपना या मुद्दा नहीं आया। पहले आप जोड़ें।
यह कहाँ से आया: पानी और सफ़ाई से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
हर बच्चे को ऐसी शिक्षा जो उसके भविष्य के लायक़ हो।
सपना
एक भारत जहाँ सरकारी स्कूल का बच्चा भी सिर उठाकर सपने देख सके। मास्टर जी रोज़ आएँ, बच्चा सच में पढ़ना-गिनना सीखे, और माता-पिता को महँगे ट्यूशन का सहारा न लेना पड़े। हर बच्चे में एक भविष्य छुपा है, स्कूल उसे खोले।
आज की सच्चाई
सरकारी स्कूल में कक्षा 3 के सिर्फ़ 23% बच्चे कक्षा 2 का पाठ पढ़ पाते हैं।
स्रोत: ASER 2024 ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
बच्चे सच में कितना सीखते हैं
भारतविश्व बैंक के सीखने के स्कोर पर भारत 399 पर है (2020), 'न्यूनतम' स्तर से बस ऊपर।
आगेवियतनाम 519 और सिंगापुर 575 पर है। वियतनाम, हमसे कम आमदनी पर, करीब 120 अंक आगे है।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींवियतनाम ने हर शिक्षक के लिए साल में 120 घंटे की सरकारी ट्रेनिंग और 15 राष्ट्रीय मानकों पर मूल्यांकन अनिवार्य किया; भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी शिक्षक-गुणवत्ता व्यवस्था कभी नहीं बनाई।
स्रोत: विश्व बैंक / OWID, 2020 ↗हमारा लक्ष्य
हर बच्चा सीखने में वियतनाम के स्तर तक (399 से 519), एक पीढ़ी में। सरकारी स्कूल का बच्चा भी दुनिया से मुक़ाबला करे।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
बच्चों को उम्र या कक्षा से नहीं, उनके सीखने के स्तर से समूह बनाकर पढ़ाना, और बुनियादी पढ़ना-गिनना पहले पक्का करना (Teaching at the Right Level)।
सबूतप्रथम संस्था के इस तरीक़े को भारत के सात राज्यों में छह नियंत्रित परीक्षणों (RCT) में बार-बार कारगर पाया गया; उत्तर प्रदेश के लर्निंग कैंपों ने एक पैराग्राफ़ पढ़ पाने वाले बच्चों की संख्या दोगुनी कर दी।
पूरी प्राथमिक पढ़ाई के दौरान स्कूल का मिड-डे मील जारी रखना, इसे सिर्फ़ पोषण नहीं, सीखने का साधन मानकर।
सबूतभारत के बड़े राज्यों के आँकड़ों (ASER 2005-2012) में, पूरी प्राथमिक पढ़ाई तक मिड-डे मील पाने वाले बच्चों के पढ़ने के अंक 18% और गणित के 9% ज़्यादा थे।
सरकारी शिक्षकों को उनके अपने बच्चों के स्वतंत्र रूप से नापे गए नतीजों में सुधार पर एक छोटा बोनस देना।
सबूतआंध्र प्रदेश के RCT में, दो साल बाद ऐसे स्कूलों के बच्चे गणित में 0.28 और भाषा में 0.16 मानक-विचलन आगे थे, और यह तरीक़ा उतना ही पैसा सिर्फ़ संसाधनों पर ख़र्च करने से ज़्यादा असरदार रहा।
असली चाबी
स्कूल इसलिए नहीं चूकते कि इमारत नहीं है, बल्कि इसलिए कि शिक्षक की हाज़िरी और बच्चे के सीखने की कोई नियमित, सार्वजनिक जाँच नहीं होती। हमारी चाबी: हर स्कूल में शिक्षक की हाज़िरी और बच्चों के बुनियादी पढ़ने-गिनने का नतीजा माता-पिता के सामने, हर साल।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
अभी इस पर कोई सपना या मुद्दा नहीं आया। पहले आप जोड़ें।
यह कहाँ से आया: स्कूल और शिक्षा से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
ऐसी गली और शहर जहाँ बेटियाँ बिना डर के निकल सकें।
सपना
एक भारत जहाँ रात की पाली से लौटती बेटी का फ़ोन घरवालों को बार-बार न करना पड़े। गली में रोशनी हो, बस स्टॉप सुरक्षित हो, और शिकायत पर कार्रवाई तेज़ हो। आज़ादी का मतलब है बिना डर के चलना।
आज की सच्चाई
2022 में महिलाओं के ख़िलाफ़ 4.45 लाख से ज़्यादा अपराध दर्ज हुए, पर बलात्कार के भी सिर्फ़ करीब 28% मामलों में सज़ा हुई।
स्रोत: NCRB, 2022 ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
लैंगिक बराबरी की रैंक
भारतलैंगिक बराबरी में भारत 146 देशों में 129वें पर है (2024), बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे।
आगेआइसलैंड पहले नंबर पर है, अपनी 93.5% खाई पाटकर, लगातार 15वें साल।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींआइसलैंड ने बराबरी को क़ानून बनाया: कंपनी बोर्डों में 40% महिला कोटा, और 2018 में दुनिया का पहला क़ानून जो समान काम के लिए महिलाओं को कम वेतन देना ग़ैरक़ानूनी बनाता है; भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं।
स्रोत: WEF लैंगिक खाई रिपोर्ट, 2024 ↗संसद में महिलाएँ
भारतलोकसभा में सिर्फ़ 13.8% सांसद महिलाएँ हैं (542 में 75)।
आगेरवांडा में यह 63.8% है, दुनिया में सबसे ज़्यादा।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींरवांडा ने 2003 के संविधान में महिलाओं के लिए कम-से-कम 30% फ़ैसले-वाले पदों का बाध्यकारी कोटा लिखा; भारत का 2023 का महिला आरक्षण क़ानून अभी लागू ही नहीं हुआ।
स्रोत: IPU Parline, 2024-25 ↗हमारा लक्ष्य
लैंगिक बराबरी में 129वें से दुनिया के टॉप 25 में, और संसद में हर तीसरी महिला। ऐसा भारत जहाँ बेटियाँ बिना डर के निकलें।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
हर थाने में एक प्रशिक्षित महिला हेल्प डेस्क (बेहतर हो कि महिला अफ़सर हो), ताकि महिलाएँ हिंसा की शिकायत आसानी से दर्ज करा सकें।
सबूतमध्य प्रदेश के 180 थानों के RCT (2018-2020) में, हेल्प डेस्क वाले थानों ने 3,360 ज़्यादा FIR दर्ज कीं; यह पूरी बढ़त महिला-संचालित डेस्कों से आई। (Science, 2022)
असुरक्षित जगहों पर वर्दीधारी गश्त, ख़ासकर महिला सुरक्षा टीमें।
सबूतहैदराबाद में हुए एक RCT में, हॉटस्पॉट पर वर्दीधारी 'SHE Team' गश्त से गंभीर छेड़छाड़ की घटनाएँ नियंत्रण इलाक़ों से 27% घटीं।
असुरक्षित जगहों पर रोशनी डालना। यह सबसे सस्ता और तेज़ क़दम है।
सबूतन्यूयॉर्क में हुए एक RCT में, जहाँ अतिरिक्त स्ट्रीटलाइट लगीं वहाँ रात के बाहरी अपराध कम-से-कम 36% घटे।
शहर की बसों में महिलाओं के लिए सफ़र बिना शुल्क करना (दिल्ली का 'पिंक टिकट'), ताकि पैसे की रुकावट हटे और महिलाएँ सार्वजनिक सफ़र ज़्यादा करें।
सबूतदिल्ली में महिलाओं की बस-सवारी 2020-21 के 25% से बढ़कर 2022-23 में 33% हुई, और फ़रवरी 2024 तक 153 करोड़ से ज़्यादा पिंक टिकट इस्तेमाल हुए; सर्वे में करीब दो-तिहाई महिलाओं ने अकेले सफ़र में ज़्यादा भरोसा बताया।
असली चाबी
असुरक्षा सिर्फ़ अपराध की बात नहीं, उन अँधेरी और सूनसान जगहों की बात है जिन्हें कोई गिनता ही नहीं, और उन शिकायतों की जिन पर कुछ नहीं होता। हमारी चाबी: महिलाओं से पूछकर असुरक्षित जगहों का नक़्शा बने, रोशनी की तय समय-सीमा सार्वजनिक हो, और हर शिकायत पर कार्रवाई का समय दिखे।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
अभी इस पर कोई सपना या मुद्दा नहीं आया। पहले आप जोड़ें।
यह कहाँ से आया: सुरक्षा और महिला सुरक्षा से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
चलने लायक़ सड़कें, भरोसेमंद बिजली, सस्ता और सुरक्षित सफ़र।
सपना
एक भारत जहाँ सड़क बारिश में तालाब न बने, बिजली दिन में दस बार न जाए, और बस समय पर आए ताकि मज़दूर और छात्र दोनों भरोसा कर सकें। बुनियादी सुविधाएँ चलें, तो बाक़ी सब चल पड़ता है।
आज की सच्चाई
हर 3 में से 2 ग्रामीण और हर 5 में से 2 शहरी घर रोज़ कम-से-कम एक बार बिजली कटौती झेलते हैं।
स्रोत: CEEW IRES, 2020 ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
प्रति व्यक्ति बिजली
भारतभारत में हर व्यक्ति साल में औसतन 1,182 यूनिट (kWh) बिजली इस्तेमाल करता है (2023)।
आगेचीन में यह 6,524 यूनिट है, यानी करीब साढ़े पाँच गुना।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींचीन ने दशकों लगातार बिजली उत्पादन और ग्रिड में निवेश किया; भारत की प्रति-व्यक्ति आपूर्ति अब भी बहुत पीछे है।
स्रोत: विश्व बैंक, 2023 ↗हमारा लक्ष्य
हर भारतीय को कई गुना ज़्यादा भरोसेमंद बिजली (चीन के स्तर की ओर), और हर शहर में दर्जे की सार्वजनिक सवारी। बुनियाद चले, तो सब चले।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
हर गाँव तक पक्की, हर मौसम में चलने वाली सड़क पहुँचाना (जैसे PMGSY)।
सबूतविश्व बैंक के अध्ययन में, सड़क जुड़ने पर गाँवों में खेती से बाहर का रोज़गार करीब 33% बढ़ा, ज़्यादा महिलाएँ काम पर निकलीं, और घर में होने वाले प्रसव 30% घटे।
मेट्रो की जगह समर्पित-लेन बस रैपिड ट्रांज़िट (BRT) बनाना: तेज़, बार-बार चलने वाली बसें, स्टेशन पर ही टिकट और समतल चढ़ाव।
सबूतकर्नाटक के हुबली-धारवाड़ BRT (22 किमी) में लॉन्च के एक साल में सवारी 90,000 प्रतिदिन पहुँची, एक घंटे का सफ़र आधा हुआ, और संतोष 56% से बढ़कर 85.5% हुआ।
घाटे में चल रहे बिजली बोर्ड को बाँटकर निजी डिस्कॉम बनाना, और बोली का पैमाना घाटा घटाने को बनाना, ताकि कंपनी का फ़ायदा चोरी और वसूली-घाटा घटाने से जुड़े।
सबूतदिल्ली में 2002 में यह करने पर बिजली का तकनीकी-व्यावसायिक नुक़सान करीब 50% (1998) से घटकर 2017 तक 15% से नीचे आ गया।
सड़क मरम्मत को बहु-वर्षीय नतीजा-आधारित ठेके में बदलना: ठेकेदार को तय गुणवत्ता बनाए रखने पर भुगतान, और हर कमी पर अपने-आप कटौती।
सबूतहिमाचल प्रदेश में तट्टापानी-दादौर सड़क का खुरदुरापन 2015 से 2019 के बीच 12,000 से घटकर 3,000 मिमी/किमी रह गया; 5 में से 3 ठेकों में लागत भी पहले से कम रही।
असली चाबी
टूटी सड़क और बार-बार जाती बिजली इसलिए चलती रहती है क्योंकि नापने और जवाब देने वाला कोई नहीं। हमारी चाबी: बिजली कब और कितनी देर जाती है यह नापकर सार्वजनिक रिकॉर्ड पर रखें, और हर सड़क के ठीक होने की तय तारीख़ लोगों के सामने हो।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
इतनी आवाज़ें इस पर आईं
यह कहाँ से आया: सड़क, बिजली और सार्वजनिक सफ़र से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
हर मौसम में साफ़ हवा, ताकि बच्चे और बुज़ुर्ग बिना डर के साँस लें।
सपना
एक भारत जहाँ सर्दियों में बच्चे को मास्क न पहनना पड़े और बुज़ुर्ग खुलकर साँस ले सकें। हवा साफ़ हो तो स्कूल बंद न हों, अस्पताल भरें नहीं, और शहर साल भर जीने लायक़ रहे।
आज की सच्चाई
दुनिया के 9 सबसे प्रदूषित शहरों में से 6 भारत में हैं, और हमारी हवा में PM2.5 WHO की सीमा से 10 गुना ज़्यादा है।
स्रोत: IQAir, 2024 ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
हवा में PM2.5
भारतभारत की औसत हवा में PM2.5 50.6 है (2024), WHO की सीमा से 10 गुना ज़्यादा; भारत दुनिया का 6वाँ सबसे प्रदूषित देश है और 100 सबसे प्रदूषित शहरों में से 74 यहीं हैं।
आगेचीन 31.0 पर है (20वाँ), भारत से करीब 38% साफ़।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींचीन ने 2013 में बाध्यकारी राष्ट्रीय वायु योजना लाई: सबसे प्रदूषित इलाक़ों में नए कोयला प्लांट रोके, पुराने पर कटौती लागू की, और 2021 तक प्रदूषण 42% घटाया; भारत के पास ऐसी समय-सीमा वाली, लागू होने वाली राष्ट्रीय योजना नहीं।
स्रोत: IQAir, 2024 ↗हमारा लक्ष्य
हर शहर की हवा WHO की सीमा तक, जैसे चीन ने एक दशक में किया। बच्चे और बुज़ुर्ग हर मौसम में खुलकर साँस लें।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
उद्योगों के प्रदूषण पर एक तय सीमा लगाकर, उन्हें परमिट ख़रीदने-बेचने का बाज़ार देना (दुनिया का पहला कण-प्रदूषण बाज़ार, सूरत)।
सबूतगुजरात के सूरत में 2019 में शुरू हुए इस बाज़ार ने हिस्सा लेने वाले उद्योगों का कण-प्रदूषण 20-30% घटाया, और साथ ही उनकी लागत भी कम की।
पराली न जलाने के लिए किसानों को नकद प्रोत्साहन देना, जिसका कुछ हिस्सा पहले और बिना शर्त मिले, ताकि कम पैसे वाले किसान भी बिना-जलाए तरीक़े अपना सकें।
सबूतपंजाब के RCT में, कुछ-पहले-भुगतान वाले किसान सामान्य ठेके से 8-12 अंक ज़्यादा पराली न जलाने पर टिके, और सैटेलाइट तस्वीरों ने जलने में साफ़ कमी दिखाई।
हर बड़ी प्रदूषक चिमनी पर अपने-आप चलने वाला रियल-टाइम निगरानी यंत्र लगाना, उसका डेटा एक सार्वजनिक मंच पर लाइव दिखाना, और साथ में सख़्त समय-सीमा वाला मानक रखना।
सबूतचीन के 256 कोयला बिजलीघरों के अध्ययन में, सख़्त मानक की समय-सीमा (जुलाई 2014) के बाद चिमनी से SO2 13.9% घटा (अलग-थलग प्लांटों में 36.8%)। (PNAS, 2018)
असली चाबी
हवा इसलिए ज़हरीली रहती है क्योंकि किसी एक इलाक़े का प्रदूषण किसका नतीजा है यह नापा और बताया नहीं जाता। हमारी चाबी: हर इलाक़े की हवा (AQI) की खुली नाप, सबसे बड़े स्रोतों की पहचान, और उन्हें घटाने का सार्वजनिक हिसाब।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
अभी इस पर कोई सपना या मुद्दा नहीं आया। पहले आप जोड़ें।
यह कहाँ से आया: हवा, प्रदूषण और साफ़ माहौल से जुड़े सपने और मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
किसान को मेहनत का सही दाम, और क़र्ज़ के जाल से निकलने का रास्ता।
सपना
एक भारत जहाँ किसान की मेहनत का सही दाम मिले, मंडी में लूट न हो, और एक ख़राब फ़सल पूरे परिवार को क़र्ज़ में न डुबो दे। जो देश का पेट भरता है, उसे ख़ुद भूखा या क़र्ज़दार नहीं रहना चाहिए।
आज की सच्चाई
औसत किसान परिवार की मासिक आय सिर्फ़ ₹10,218 है, और 50% से ज़्यादा किसान परिवार क़र्ज़ में डूबे हैं।
स्रोत: NSS 77वाँ दौर (NSO), 2019 ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
धान की पैदावार प्रति हेक्टेयर
भारतभारत में धान की पैदावार 4.31 टन प्रति हेक्टेयर है (2023), दुनिया के औसत (4.76) से भी कम।
आगेचीन में यह 7.14 टन है, यानी करीब 65% ज़्यादा।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींचीन ने 1976 से हाइब्रिड धान अपनाया और अब आधे से ज़्यादा धान-क्षेत्र में लगाता है (हर एकड़ 15-30% ज़्यादा); भारत में हाइब्रिड सिर्फ़ करीब 7% क्षेत्र पर है।
स्रोत: FAO / OWID, 2023 ↗गेहूँ की पैदावार प्रति हेक्टेयर
भारतगेहूँ में भारत की पैदावार करीब 3.5 टन प्रति हेक्टेयर है (2023), दुनिया के औसत के आसपास।
आगेफ़्रांस में यह 7.2 टन है, करीब दोगुना; चीन 5.78 टन।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींफ़्रांस ने दशकों लगातार सार्वजनिक बीज-शोध और सटीक खेती को जोड़ा; भारत ने वैसा बीज-बदलाव और कृषि-विज्ञान पैकेज नहीं अपनाया।
स्रोत: FAO / OWID, 2023 ↗हमारा लक्ष्य
हर खेत की पैदावार चीन के स्तर तक, और किसान की आमदनी दोगुनी। जो देश का पेट भरता है, वो ख़ुद ख़ुशहाल हो।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
मंडियों को राष्ट्रीय ऑनलाइन नीलामी मंच (eNAM) से जोड़ना, ताकि कोई भी पंजीकृत व्यापारी ऑनलाइन बोली लगा सके और किसान को सीधे बैंक खाते में भुगतान मिले।
सबूतसरकार की समीक्षा में, eNAM पर बेचने वाले किसानों को पहले की तुलना में 5.5% ज़्यादा दाम मिला, जो सभी सर्वे किए गए राज्यों के असली आँकड़ों से निकला।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर बड़ी सब्सिडी देना ('पर ड्रॉप मोर क्रॉप'), ताकि किसान बाढ़-सिंचाई छोड़ें, पैदावार बढ़े और पानी-बिजली बचे।
सबूत5 राज्यों के सरकारी मूल्यांकन में, सूक्ष्म-सिंचाई अपनाने से फ़सलों की आमदनी में कुल 166% की बढ़त हुई; गन्ने में पानी का ख़र्च 69% और पंपिंग 53% घटी।
सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, बिजली और भरोसेमंद गेहूँ-ख़रीद में लगातार बढ़ा हुआ बजट लगाना (मध्य प्रदेश का तरीक़ा)।
सबूतमध्य प्रदेश की खेती की GDP 2005-06 से 2014-15 तक सालाना 9.7% बढ़ी (किसी भी बड़े राज्य में सबसे ज़्यादा), और हाल के पाँच सालों में 14.2%, जबकि राष्ट्रीय औसत 4.0% था। (ICRIER, 2017)
असली चाबी
किसान इसलिए नहीं पिसता कि स्कीमें नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उसे मंडी का सही दाम, समय पर भुगतान और बकाया दावों का कोई भरोसा नहीं। हमारी चाबी: मंडी के दाम बनाम MSP का खुला फ़र्क़, और किसानों के अटके भुगतान का सार्वजनिक ट्रैकर, हर देरी की तय समय-सीमा के साथ।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
अभी इस पर कोई सपना या मुद्दा नहीं आया। पहले आप जोड़ें।
यह कहाँ से आया: खेती और किसान से जुड़े मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
हर परिवार के सिर पर पक्की छत, और हर बस्ती में पानी, शौचालय और नाली।
सपना
एक भारत जहाँ शहर बनाने वाले मज़दूर का अपना घर भी पक्का हो। हर बस्ती में पानी, शौचालय और नाली हो, और एक परिवार को बारिश में छत टपकने या बेदख़ली के डर में न जीना पड़े। शहर सबका है, उसकी सुविधाएँ भी सबकी हों।
आज की सच्चाई
शहरों में 6.5 करोड़ से ज़्यादा लोग झुग्गियों में रहते हैं (शहरी आबादी का 17%), और 71% झुग्गी बस्तियों में भूमिगत सीवर तक नहीं।
स्रोत: जनगणना 2011 (NBO) ↗दुनिया में हम कहाँ खड़े हैं
ईमानदारी से: इस मोर्चे पर बाक़ी दुनिया कहाँ है, और जो आगे हैं उन्होंने ऐसा क्या किया जो हम नहीं कर पाए।
खुले में शौच
भारतभारत में अब भी 11.7% लोग खुले में शौच करते हैं (2022), संख्या में दुनिया में सबसे ज़्यादा (करीब 15.7 करोड़)।
आगेइंडोनेशिया में यह 4.4% है (2000 के 32% से गिरकर); चीन और थाईलैंड ने इसे करीब-करीब ख़त्म कर दिया।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींइंडोनेशिया ने समुदाय-आधारित सफ़ाई अभियान के साथ ग़रीब बस्तियों में पानी, नाली और शौचालय का वहीं-सुधार जोड़ा, सिर्फ़ बने शौचालय गिनने के बजाय।
स्रोत: विश्व बैंक / JMP, 2022 ↗शहरों में सुरक्षित शौचालय
भारतशहरों में सिर्फ़ 53% लोगों के पास सुरक्षित-प्रबंधित शौचालय है (2022)।
आगेचीन में यह 85% है, करीब 31 अंक आगे।
उन्होंने ऐसा क्या किया, जो हमने नहींचीन ने शहर बढ़ने के साथ सीवर और मैला-शोधन का जाल बनाया (सिर्फ़ शौचालय नहीं), इसलिए ज़्यादातर शहरी मैला इकट्ठा होकर शोधित होता है।
स्रोत: विश्व बैंक / JMP, 2022 ↗हमारा लक्ष्य
खुले में शौच शून्य, और हर शहरी परिवार को सुरक्षित, शोधित सफ़ाई। शहर बनाने वाले का अपना घर भी पक्का हो।
जो सच में काम करता है
ये नारे नहीं हैं। हर एक कहीं न कहीं आज़माया और नापा जा चुका है।
झुग्गी के परिवारों को उनकी ज़मीन का क़ानूनी हक़ देना, फिर वहीं पानी, शौचालय, नाली और सड़क पहुँचाना (ओडिशा का जगा मिशन)।
सबूतओडिशा के जगा मिशन ने करीब 50,000 परिवारों को ज़मीन का हक़ दिया और बस्तियों में पाइप से पानी, शौचालय, नाली, बिजली और पक्की सड़कें पहुँचाईं; इसे विश्व स्तर पर सम्मान मिला और पंजाब में भी इसे अपनाया जा रहा है।
झुग्गियों को वहीं सुधारना (हटाना नहीं), लागत नगर-निगम, समुदाय और निजी भागीदारों में बाँटकर: हर घर को पानी, सीवर, अपना शौचालय, पक्की गली और नाली।
सबूतअहमदाबाद के स्लम नेटवर्किंग कार्यक्रम (परिवर्तन) में 2006 तक 32 बस्तियों के 4,940 घरों (करीब 24,700 लोग) को पूरी बुनियादी सुविधाएँ मिलीं।
एक माँग-आधारित राष्ट्रीय शहरी आवास योजना चलाना जिसमें कई रास्ते हों (ख़ुद बनाओ, साझेदारी में किफ़ायती घर, वहीं स्लम पुनर्विकास), हर घर पर तय केंद्रीय सहायता, और जियो-टैग से जाँच।
सबूत29 जुलाई 2024 तक PMAY-शहरी के तहत 1.18 करोड़ घर मंज़ूर और 85.4 लाख बनकर तैयार हुए (करीब 69% पूरे)।
असली चाबी
घर और सुविधाएँ इसलिए नहीं पहुँचतीं क्योंकि 'मंज़ूर' और 'बनकर तैयार' के बीच का फ़र्क़ कोई नहीं दिखाता। हमारी चाबी: मंज़ूर बनाम सच में बने घरों, और हर बस्ती में पानी-शौचालय-नाली की कमी का सार्वजनिक ट्रैकर, ताकि अधूरा काम छुप न सके।
हम यहाँ क्या करेंगे
ऊपर का सबूत दिखाता है कि यह हो सकता है। यह रहा हमारा तरीक़ा: जहाँ हमारा उम्मीदवार जीते, उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में पहले 100 दिन के लिए यही ठोस काम बँधेगा।
आप क्या कर सकते हैं
अभी इस पर कोई सपना या मुद्दा नहीं आया। पहले आप जोड़ें।
यह कहाँ से आया: घर, झुग्गी और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दे
यह हमारी दिशा है, वादा नहीं। जहाँ हमारा उम्मीदवार जीतेगा, यही काम उसके विकास कॉन्ट्रैक्ट में तय समय-सीमा के साथ लिखा जाएगा, और हर तिमाही उसका सार्वजनिक हिसाब आएगा।
समर्थन देने के लिए सदस्य के तौर पर लॉगिन करें। आपका वोट हर किसी के बराबर गिना जाता है।
सपना, सबूत के साथ
हर मोर्चे पर वही फ़र्क़: हवाई वादा नहीं, नापा हुआ रास्ता।
इन सबके नीचे एक ही टूटी चीज़
स्कीमें कम नहीं हैं, पैसा भी ऊपर से आता है। टूटता वहाँ है जहाँ किसी एक का नाम लेकर यह पूछा ही नहीं जाता कि काम सच में हुआ या नहीं। 39% राज्य राजधानियों के पास कोई एक्टिव मास्टर प्लान तक नहीं, और नागरिक वॉर्ड कमिटियाँ ज़्यादातर सिर्फ़ काग़ज़ पर हैं। हम वही टूटी परत दोबारा बनाते हैं: हर काम पर एक नाम, एक तारीख़, और सबके सामने हिसाब।
स्रोत: Janaagraha ASICS 2023 ↗और जहाँ यह परत ठीक हुई, वहाँ नतीजे आए। केरल ने पहले पैसा और फ़ैसले स्थानीय सरकारों को सौंपे, फिर उनकी क्षमता बनाई। आज वहाँ स्थानीय सरकारों के पास बड़ा अधिकार है और नागरिकों के प्रति ऊँची जवाबदेही भी।
स्रोत: विश्व बैंक, केरल विकेंद्रीकरण ↗नागरिक अपने इलाक़े का मुद्दा दर्ज करते हैं।
लोग अपने मोहल्ले में Circle बनाते हैं।
Members अपना candidate ख़ुद चुनते हैं।
Candidate public में Vikas Contract sign करता है।
ज़मीन पर काम शुरू होता है।
हर 100 दिन / 6 महीने / साल: public report card.
पुरानी राजनीति की सबसे बड़ी चालाकी: घोषणापत्र चुपचाप बदल जाता है, पुराना वर्शन ग़ायब। यहाँ ऐसा नहीं हो सकता। जब भी कोई संकल्प बदलेगा, पुराना वर्शन रिकॉर्ड पर रहेगा, मिटाया नहीं जाएगा। यह कोई वादा नहीं, यह हम पहले ही कर के दिखा चुके हैं।
देखें: फंडिंग का नियम हमने सबके सामने पलटा, और पुराना वर्शन रिकॉर्ड पर छोड़ दिया।
वो बदलाव फ़ैसलों के लॉग में देखें →आगे जैसे-जैसे हम बढ़ेंगे, हर संशोधन सदस्यों के गुप्त मतदान से होगा, और हर वर्शन यहीं पक्का रिकॉर्ड बनेगा।
अभी कोई प्रस्ताव खुला नहीं है। जब हम काफ़ी सदस्य हो जाएँगे, पहला प्रस्ताव कोई सदस्य ही रखेगा। वो आप हो सकते हैं।
संशोधन ऊपर से थोपे नहीं जाते। हर बदलाव सदस्यों के गुप्त मतदान से तय होगा, नतीजा सबके सामने। यह व्यवस्था बन रही है, आज दिखावे के लिए चालू नहीं की गई।
संकल्प बदल सकते हैं, पर कुछ नियम संस्थापक पर भी हमेशा के लिए बँधे हैं। इन्हें यह मतदान भी नहीं बदल सकता।
ये बाध्यकारी वादे पढ़ें →सपना देखना आसान है। सबूत के साथ सपना देखना, और हर कदम का हिसाब देना, यही फ़र्क़ है।
पसंद आया? याद रखें: यह दिशा है। इसे बाध्यकारी बनाने का इकलौता तरीक़ा हर उम्मीदवार का विकास कॉन्ट्रैक्ट है।
ये भी देखें: सब कुछ खुद जाँचें